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जिस्म की जरूरत-5


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indian sex उसके बाद वो अपनी जगह जाकर सो गया, लेकिन मेरे दिमाग में उसके मुट्ठ मारने की तस्वीर ही घूम रही थी। ऐसा नहीं था कि मैंने विजय का औजार पहली बार देखा था, लेकिन पूरी तरह से खड़ा साफ़ साफ़ पहली बार ही देखा था, और पहली बार ही उसमें से वीर्य की धार निकलते हुए देखी थी। लेकिन जो कुछ विजय कर रहा था वो नैचुरल नहीं था, इस तरह वो अपना शरीर बर्बाद कर रहा था। वो अपने मन का गुबार बाहर निकालने के लिये हस्त मैथुन को इस्तेमाल कर रहा था। वो जबर्दस्ती मुट्ठ मार रहा था, और वो इसको एन्जॉय भी नहीं कर रहा था। मुझे लगा कि मुझे जल्द ही कुछ करना होगा, नहीं तो विजय अपनी जिंदगी बर्बाद कर लेगा।

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मेरे दिमाग में बस विजय के खड़े हुए लण्ड से निकलते वीर्य की पिचकारी की तस्वीर घूमती रहती, विजय का लण्ड उसके पापा से भी बड़ा है। मुझे विजय में उसके पापा की जवानी के दिन दिखायी देने लगे। मैं शायद विजय को प्यार करने लगी थी, लेकिन कहीं ना कहीं मुझे पता था कि ये गलत है। लेकिन मेरा जिस्म मेरे दिमाग की बात नहीं सुन रहा था, और विजय के लण्ड की कल्पना करते करते मेरी चूत पनियाने लगती, मेरी चूत को भी तो तेरे पापा की मौत के बाद कोई लण्ड नहीं मिला था। मेरे बदन में कुच कुछ होने लगता, मेरा चेहरा लाल पड़ जाता, मेरा मन करता कोई मुझे अपनी बाँहों में भर ले और मुझे जी भर के चोदे, मेरी चूत का कचूमर निकाल दे। हाँ ये बात सही थी कि मेरा बेटा विजय ही मेरी चूत को पनियाने पर मजबूर कर रहा था। किसी तरह अपनी फ़ड़फ़ड़ाती हुई चूत में ऊँगली घुसाकर उसको घिसकर, विजय के मुट्ठ मारते हुए द्रष्य की कल्पना करते हुए अपने जिस्म की आग को ठण्डा करने का प्रयास करती।

अगले कुछ दिनों तक मैं विजय की ईमोशनल प्रोब्लम का निदान ढूँढने की जगह अपने अंदर चल रहे अन्तर्द्वन्द पर काबू करने का प्रयास करने लगी, जब भी विजय फ़ैक्ट्री से लौटकर घर आता, तो मैं उसके साथ ज्यादा से ज्यादा वक्त बिताने का प्रयास करती। मैं उसके लिये उसका मन पसंद खाना बनाती जिससे वो कुछ ज्यादा खा ले और उसकी भूख खुल जाये। थोड़ा कुछ तो बेहतर हो रहा था, लेकिन रात में विजय का अपनी मम्मी के गुप्तांगों को नंगा देखकर मुट्ठ मारना बदस्तूर जारी था। और मैं हर रात उसको ऐसा करते हुए देखती।

रात में विजय को मुट्ठ मारते देख कर मैं गर्म हो जाती और अगले दिन सुबह नहाते हुए मैं भी अपनी चूत में ऊँगली घुसाकर अपनी आग बुझाती। समस्या का समाधान अब दिखाई देने लगा था, कि विजय को चुदाई के लिये एक औरत के जिस्म की जरुरत थी, आखिर वो कब तक मुट्ठ मारता, उसको एक जीती जागती औरत जो उसे चूम सके चाट सके उसके जिस्म की जरुरत पूरी कर सके, एक ऐसी औरत चाहिये थी। मेरी नजर में शायद अब एक यही उपाय बचा था।

कभी कभी मुझे लगता कि शायद अपने बेटे विजय के लिये वो औरत मैं ही हूँ, मैं उसकी मदद कर सकती हूँ, मैं उसको छू सकती थी, मैं उसे प्यार कर सकती थी, इसमें कोई शक नहीं था। लेकिन फ़िर कभी मेरे दिमाग में ख्याल आता कि नहीं ये गलत है, माँ बेटे के बीच ऐसा नहीं होना चाहिये। मुझे अपने सगे बेटे के साथ चुदाई करने में कोई बुराई नहीं दिखायी देती थी, आखिर हम दोनों व्यस्क थे, और हमको अपने मन का करने का अधिकार था। लेकिन उस सीमा रेखा को पार करने में एक झिझक जरुर थी। यदि उन दोनों के बीच जिस्मानी रिश्ते बन गये, तो फ़िर उस माँ बेटे के रिश्ते का क्या होगा। कहीं वो एक समस्या का समाधान ढूँढते एक नयी समस्या ना खड़ी कर दें।

कभी कभी मेरे मन में विचार आता कि मेरी चूत और मम्मों को देखकर मुट्ठ मारना एक अलग बात है, लेकिन क्या विजय उसके साथ चुदाई करने को तैयार होगा। ये सोचकर ही मैं घबरा जाती। यदि विजय इसके लिये तैयार ना हुआ तो। लेकिन जब भी मैं नहाते हुए अपने 42 वर्ष के गदराये नंगे जिस्म को देखती तो मेरा मन कह उठता, विजय उसको अस्वीकार कर भोगे बिना नहीं रह सकता।

हाँलांकि मेरे मम्मे अब वैसे नुकीले तो नहीं थे जैसे कि मेरी 20 साल की उम्र में चुँचियाँ थीं, लेकिन फ़िर भी मेरे मम्मे बहुत बड़े बड़े और मस्त गोल गोल थे, जिन पर आगे निकले हुए निप्प्ल उनकी शोभा दो गुनी कर देते थे। मेरा पेट भी अब पहले जैसा सुडौल नहीं था, लेकिन फ़िर भी रामदेव का योगा कर के मैं अपने आप को शेप में रखने का प्रयास करती थी। मेरा पिछवाड़ा बहुत भारी था, और ये मेरी पर्सनलीटी में चार चाँद लगा देता था। मैं जहाँ भी जाती मर्दों की नजर बरबस मेरी गाँड़ पर टिक ही जाती थी।

शाम को जब मैं विजय के फ़ैक्ट्री से लौटने का इन्तजार करती तो मन ही मन उसके साथ सैक्स करने के विचार मेरे मन में आ ही जाते। मैं फ़िर भलाई बुराई गिनने में लग जाती, लेकिन किसी भी निश्कर्ष पर पहुँचना मेरे लिये मुश्किल होता जा रहा था, और मैं झिझक और जिस्म की आग के बीच मानो फ़ँस गयी थी।

लेकिन फ़िर कुछ ऐसा हुआ, जिससे अपने आप ही सब कुछ होता चला गया।

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