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जिस्म की जरूरत-20


hindi sex kahani उस जबर्दस्त चरमोत्कर्ष के बार मेरी तो मानो आवाज ही गायब हो गयी, मेरे पूरे बदन में गजब का हल्कापन मेहसूस हो रहा था। मैंने करवट लेकर अपना सिर विजय की छाती के ऊपर रख दिया, और सोचने लगी किस तरह मैंने अपने बदन को अपने बेटे को सौंप उसकी बाँहों में समर्पण कर चुदाई का मजा लिया था, किस तरह उसने मेरी चूत को वीर्य के गाढे पानी से भर दिया था, मैं उन पलों का आँख बंद कर संवरण करने लगी।

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विजय ने पहली बार किसी चूत में अपना लण्ड घुसाकर चुदाई का मजा लिया था, उसके लिये यह इसलिये और ज्यादा अविस्मरणीय था क्योंकि वो चूत उसकी प्यारी मम्मी की थी। लेकिन शायद विजय और मेरा दोनों का ही मन अभी भरा नहीं था।

कुछ देर वैसे ही लेट कर आराम करते हुए, हम दोनों एक दुसरे को सहलाते हुए, चूमते हुए, साथ चिपक कर अठखेलियाँ करते रहे। और फ़िर नींद के आगोश में चले गए।

अगले दिन सारा समय हम एक दूसरे के साथ उस होटल के कमरे में एक साथ ही रहे। हम दोनों ही ज्यादा से ज्यादा समय एक दूसरे का साथ ही रहकर बिताना चाहते थे। सारा दिन हम दोनों ने कभी चूसकर तो कभी चुदाई करते हुए बिताया, बस खाना खाने, पानी पीने और टॉयलेट जाने को छोड़कर हम कामक्रीड़ा में व्यस्त रहे।

जब हम दोनों बिस्तर में ना भी होते, तब भी हम दोनों नंगे ही रहते, और एक दूसरे के नग्न बदन के स्पर्षसुख का मजा लेते रहते। जब चाहे एक दूसरे के होंठों को चूम लेते, जिस से जिस्म की भूख फ़िर जाग उठती और हमारे जिस्म एक दूसरे में आलिंगनबद्ध हो जाते, और हम फ़िर से चुदाई शुरू कर देते। हम किशोर नवविवाहितों जैसा बर्ताव कर रहे थे, हम माँ बेटे प्यार के बंधन को समझते हुए बार बार एकाकार हो जाते।

शाम हो गयी थी, बाहर अंधेरा होने लगा था, और मैं बिस्तर पर घोड़ी बनी हुई कराह रही थी, विजय पीछे से अपना लण्ड मेरी चूत में तेजी से पेल रहा था, तभी उसने मेरी वीर्य से भरी चूत में से अपना लण्ड फ़च्च की आवाज के साथ बाहर निकाल लिया, मुझे रिक्तता का अनचाहा अनुभव होने लगा। लेकिन जैसे ही विजय के लण्ड ने मेरी गाँड़ के छेद को छुआ तो मेरी नाराजगी खुशी में तब्दील हो गयी। हाँफ़ते हुए विजय ने अपने फ़नफ़नाते वीर्य के पानी से चिकने हुए लण्ड के सुपाड़े को मेरी गाँड़ की मोटी गुदाज गोलाईयों के बीच की दरार में घुसाते हुए मेरी गाँड़ के छेद पर सहलाना शुरू कर दिया।

सिर उठाकर कंधे के ऊपर से पीछे देखते हुए मैंने शैतानी भरे अंदाज में कहा, ”ओह बेटा, मैं तो सोच रही थी कि कहीं तू मेरे उस छोटे से छेद को भूल तो नहीं गया!”

विजय थोड़ा शर्माते हुए हँस दिया, लेकिन जब उसकी आँखें मेरी आँखों से मिली तो उनमें वासना साफ़ झलक रही थी। ”ऐसा हो सकता है क्या मम्मी! मैं तो आपकी चूत को बस थोड़ा आराम देना चाह रहा था बस…”

”ऑ… मेरा प्यारा बेटा, कितना समझदार है!”

बैड पर उल्टा लेटे हुए अपनी गाँड़ की गोलाईयों को अपने दोनों हाथों में भरकर मैंने अपनी गाँड़ को चौड़ा करके खोल दिया, जिससे विजय मेरी गाँड़ के छोटे से गुलाबी छेद में लण्ड आसानी से घुसा सके, ऐसा करते हुए मेरे चेहरे पर चिर परिचित मुस्कान आ गयी। जैसे ही विजय ने मेरे ऊपर आते हुए अपने बदन का भार मेरे ऊपर डाला, मैं मस्त होकर कसमसाकर उठी और मेरे मुँह से हल्की सी चीख निकल गयी। जब विजय मेरी गाँड़ में अपने लण्ड को आसानी से घुसाने के लिये अपने वीर्य के पानी और मेरी चूत के रस से चिकना कर रहा था, तो बस उसकी हल्के हल्के गुर्राने की आवाज और मेरे कराहने की धीमी आवाजों के सिवा और कोई वार्तालाप नहीं हो रहा था।

इससे पहले कि विजय का लण्ड मेरे गुदाद्वार में प्रवेश करता, मैं अपनी गाँड़ में विजय के लण्ड के घुसने की उत्सुकता के कारण अपने बेटे के सामने पूर्ण रूप से समर्पण कर चुकी थी। मैंने अपनी गाँड़ की माँसपेशियों को ढीला कर दिया, और विजय के वीर्य के वीर्य के पानी से चिकने हुए लण्ड को मेरी रबर समान लचीली गाँड़ में घुसने में जरा भी दिक्कत नहीं हुई। जैसे ही विजय के मूसल जैसे लण्ड ने मेरी गाँड़ के छेद को चौड़ा करते हुए धीरे से अंदर प्रवेश करना शुरू किया, मैं कराह उठी। विजय जैसा पहले कई बार कर चुका था, उसी तरह आराम से मेरी गाँड़ में अपना लण्ड घुसाकर, उसको अंदर बाहर करते हुए पेलना शुरू कर दिया। मेरी गाँड़ के द्वार को पूरी तरह खुलने के लिये शुरू में वो हल्के हल्के झटके मार रहा था, और साथ साथ मेरी अनोखी टाईट गाँड़ की गर्माहट का मजा ले रहा था। और फ़िर उसने अपना पूरा लण्ड मेरी गाँड़ में घुसा दिया, उसके टट्टे मेरी चूत से टकराने लगे।

विजय ने अपना एक हाथ बैड पर टिका कर अपना वजन उस प ले लिया, और दूसरे हाथ से वो मेरी चूत के दाने को सहलाने लगा। विजय का मांसल बदन मेरे गदराये गुदाज शरीर के ऊपर छाया हुआ था, और मेरी गाँड़ उसके लण्ड की मोटाई के अनुसार अपने आप को ऐड्जस्ट कर रही थी। विजय का सिर मेरे कन्धे पर टिका हुआ था, और वो मेरी गर्दन को चूमते हुए अपनी कमर को आगे पीछे कर अपने लण्ड से मेरी गाँड़ में आराम से धीरे धीरे गहरे झटके मार रहा था।

मजे से गाँड़ मरवाने का जुनून इस कदर मेरे ऊपर सवार हो गया था कि मैं विजय के गुर्राने का जवाब भी अपनी धीमी चीखों के साथ नहीं दे रही थी। हर झटके के साथ जब उसका लण्ड मेरी गाँड़ में अंदर घुसता तो बार बार विजय अपनी मम्मी की गाँड़ की भक्ती की गवाही देता, और मेरे कान को चूसते हुए, धीमे से मेरी तारीफ़ के कुछ शब्द कह देता। जिस तरह से मेरी चूत के दाने के सहला कर गोलाई में मसलते हुए विजय मेरी टाईट गाँड़ के छेद में अपने मोटे लण्ड को अंदर गहराई तक पेल रहा था, मैं मस्त होकर निढाल होते हुए लम्बी लम्बी साँसे लेते हुए खुशी से काँप रही थी।

और फ़िर जब विजय झड़ा तो जितना भी वीर्य उस दिन के चुदाई समारोह के दौरान उसकी गोटियों में बचा था उसने मेरे गुदा द्वार को भर दिया। मैं तो इतनी बार झड़ चुकी थी कि मानो मैं निढाल होकर बेहोश हो चुकी थी। लेकिन एक बार अंत में फ़िर से मेरा बदन में झड़ते हुए काँप उठा, ऐसा विजय के मेरे चूत के फ़ूले हुए दाने को रगड़ने की वजह से हुआ। लेकिन मुझे पता नहीं चल रहा था कि मस्ती मेरी चूत में आ रही थी या फ़िर ऐंठते हुए संवेदनशील गाँड़ के छेद में से।

उस वक्त ये बात कोई मायने नहीं रखती थी। चरमोत्कर्ष की ऊँचाई से नीचे आते हुए हम दोनों माँ बेटे अगल बगल टाँग में टाँग फ़ँसा कर, दोनों पसीने में तरबतर निढाल होकर हाँफ़ रहे थे, और एक दूसरे को जकड़े हुए लेटे हुए थे। नींद के गहरे आगोश में जाते हुए मेरी आँखों के बंद होने से पहले मुझे बस इतना याद है कि विजय मेरे मम्मों को अपनी बाहों में जकड़ते हुए मेरी गर्दन को चूम रहा था।

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